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Dharmik Stance on Hindi, हिंदी दिवस विशेष

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हिंदी भाषा की भारत में तीन प्रमुख शैलियां (style) हैं 1. संस्कृतनिष्ठ हिंदी (संस्कृत शब्दों की अधिकता) 2. उर्दू  (अरबी फारसी शब्दों की अधिकता) 3. हिंदुस्तानी( मिली-जुली आम बोलचाल) इसके अलावा बम्बईया हिंदी (यही टपोरी वाली), मद्रासी हिंदी (अरे अपनी अन्ना रास्कला  माइंड इट की साउथ स्टाइल वाली), सोनिया गांधी स्टाइल ( चिढाम्बरम जी बेख़सूर है) और अरबी, अफगानी टाइप (ओ खबीस का बच्चा तुम हमको गधा बोलती) आदि कई प्रकार की भी हिंदी हो सकती है। ....पर यहाँ याद रखना सभी जगह भाषा #हिंदी ही है । ....कल को कोई आपको ये बहकायेगा कि हिंदी, उर्दू अलग अलग भाषा हैं तो भगवान भोलेनाथ का नाम लेके चार पड़ाका उसके कान के नीचे धर सकते हो। .....क्योंकि उर्दू कोई अलग भाषा नहीं बल्कि हिंदी भाषा को बोलने का एक अलग style(शैली) है...भाषा तो हिंदी ही है।....बस कुछ लोग इसे फ़ारसी लिपि में अरबी फ़ारसी के कुछ शब्दों को मिलाकर लिखने बोलने लगे तो हम इसे अलग भाषा कह दें ? (ये विशुद्ध तूचियापा है)।          'उर्दू' या 'ओरदू' शब्द मूलतः तुर्की भाषा का है तथा इसका अर्थ है- 'शाही शिविर’ या...

Real culprit in Democracy is the Public itself. Dharmik Stance on Govt. Employees.

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 ये News देखिये, उसके साथ इस खबर को स्पष्ट करता हुआ ये परफेक्ट वीडियो भी देखिए। ....अब ठंडे दिमाग से सोचिये कि इन सरकारी दामाद (सरकारी कर्मचारियों) को कौनसे दुष्टों की कैटेगरी में रखोगे ?? ......मैं बार बार कहता आया हूँ कि देश की साधारण जनता जिन समस्याओं का रोना रोती रहती हैं उनमें बहुत बड़ा योगदान खुद जनता का ही है। क्योंकि एक तो सैद्धांतिक रूप से देश में शासन चलाने हेतु लोकतंत्र चल रहा है और प्रशासन भी इस जनता में से ही आने वाले लोग चला रहे हैं। ......ये ऐसे ढेरों (मेरे अंदाज से 70%) हरामखोर, निकम्मे, घूसखोर और जनता को परेशान रखने वाले सरकारी कार्यालयों के कर्मचारी, बाबू, पुलिस वाले, सरकारी अधिकारी आदि कहीं मंगल ग्रह से उतरकर नहीं आते, किसी राजनैतिक दल के नेता/कार्यकर्ता नहीं होते (जिन्हें हम हर समस्या के लिए कोस देते हैं)। ये सब इसी आम जनता में से आते हैं। ये सारे सरकारी दामाद हममें से किसी के कोई पारिवारिक सदस्य, रिश्तेदार या मित्र ही होते हैं। ....आप याद करने की कोशिश करिये, अगर आपको जीवन में कोई सरकारी काम में परेशानी हुई है या निजी जीवन में कोई लड़ाई झगड़ा या किसी की दादागिरी स...

OBC is the last Obstacle for Breaking India Forces

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          मैं एक जाट हूँ; जाहिर है एक भारतीय हिन्दू हूँ परन्तु अचरज में हूँ कि हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन से चर्चा में आये कोई यूनियनिष्ट मिशन वाले व कुछ अन्य दुष्टों ने सोशल मीडिया में बैठकर हरियाणा से लेकर राजस्थान, up तक के जाटों में इतना जाटत्व भर दिया है कि बहुत से जाट युवा, हिंदुत्व से दूर हो सकते हैं। जाट प्राइड और जाट एकता वाले नारों के बीच वो कहते हैं कि जाट हिन्दू नहीं होते, जाट खुद एक अलग धर्म है, हिन्दू तो कोई धर्म होता नहीं; बल्कि पश्चिम यूपी के जाट गोत्र वाले(धर्मान्तरित) मुसलमानों को अपना भाई बताते हुए जाट नस्ल की बात करते फिरते हैं। किसान जातियों को इस जातिवाद के भ्रमजाल में उलझाने हेतु उनका बाकायदा नारा है "लड़ाई फसल और नस्ल की है"। शायद आपको पहले से पता हो, पर आजकल चल रहे इस कथित किसान आंदोलन को जाट आंदोलन बनते देखकर आपको फिर से बता रहा हूँ...कि ये सब कहानी उसी दिशा में है, कि भाई "जाट तो हिन्दू नहीं होते"। मेरे जैसे चंद लोग इनसे कई सालों से सोशल मीडिया में जूझ रहे हैं(क्योंकि इनका अटैक वहीं से शुरू होता है) और इधर जाटत्व से भरे भोले ...

Dharmik Stance क्या और क्यों ?

  हम लोग किसी न किसी सामाजिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि प्रकार के स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर समाचार या परिस्थितियों को देख अपने विचार बनाते, प्रकट करते या उससे भी आगे बढ़कर वाद-विवाद और व्यवहार द्वारा प्रचार तक करते हैं। Dharmik Stance का पूरा काम ही इस पर है कि वो विचार और विचारों के उपरांत व्यवहार बनने की प्रक्रिया में हमारी मंशा, चेतना, और विवेक अनुसार हमारा रुख/पक्ष/स्थिति यानि हमारा Stance क्या हो और वो क्यों हो ? What is Dharmik Stance - जो Stance न पक्ष से न विपक्ष से और इंटेरेस्टिंगली न ही किसी कथित निष्पक्ष(?) से। हर विचार और व्यवहार केवल DHARMA अनुसार यानि धर्म के पक्ष से। Why Dharmik Stance - धर्म(Dharma) स्वाभाविक रूप से लोगों की अंतरात्मा में तो बसता है परंतु बाहरी प्रचार/बोलबाला/वर्चस्व अधर्म (Adharma) का अधिक है और धर्म(Dharma) का कम । To reverse this, Dharmik Stance is required.