Real culprit in Democracy is the Public itself. Dharmik Stance on Govt. Employees.

 ये News देखिये, उसके साथ इस खबर को स्पष्ट करता हुआ ये परफेक्ट वीडियो भी देखिए।




....अब ठंडे दिमाग से सोचिये कि इन सरकारी दामाद (सरकारी कर्मचारियों) को कौनसे दुष्टों की कैटेगरी में रखोगे ??

......मैं बार बार कहता आया हूँ कि देश की साधारण जनता जिन समस्याओं का रोना रोती रहती हैं उनमें बहुत बड़ा योगदान खुद जनता का ही है। क्योंकि एक तो सैद्धांतिक रूप से देश में शासन चलाने हेतु लोकतंत्र चल रहा है और प्रशासन भी इस जनता में से ही आने वाले लोग चला रहे हैं।

......ये ऐसे ढेरों (मेरे अंदाज से 70%) हरामखोर, निकम्मे, घूसखोर और जनता को परेशान रखने वाले सरकारी कार्यालयों के कर्मचारी, बाबू, पुलिस वाले, सरकारी अधिकारी आदि कहीं मंगल ग्रह से उतरकर नहीं आते, किसी राजनैतिक दल के नेता/कार्यकर्ता नहीं होते (जिन्हें हम हर समस्या के लिए कोस देते हैं)। ये सब इसी आम जनता में से आते हैं। ये सारे सरकारी दामाद हममें से किसी के कोई पारिवारिक सदस्य, रिश्तेदार या मित्र ही होते हैं।

....आप याद करने की कोशिश करिये, अगर आपको जीवन में कोई सरकारी काम में परेशानी हुई है या निजी जीवन में कोई लड़ाई झगड़ा या किसी की दादागिरी सहनी पड़ी है तो किसी राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी की वजह से हुई है या इन सरकारी दामादों (पुलिस, सरकारी बाबू, सरकारी अधिकारी) या आम जनता में से निकले चोर, लुटेरे, गुंडे,बदमाशों से हुई हैं। आप गजब देखिये ये कष्ट देने वाले लोग अपने आप को आम जनता ही कहते हैं।

.....राजनेता, मंत्री,सांसद,विधायक,सरपंच आदि लोग हो सकता है आपके यहाँ किये सड़क,पानी,बिजली, विकास आदि वादे पूरे न करें और आपको मिल सकने वाली सुविधाएं पूरी नहीं कर पाते हैं, सरकारी बजट में मिले पैसे को पूरा का पूरा आपके विकास कार्य में नहीं लगाते हैं। लेकिन किसी आम आदमी को ये पॉलिटिशियन घर जाकर तंग नहीं करते, जब भी मिलते हैं हाथ जोड़कर प्यार प्रेम से मिलते हैं क्योंकि इन्हें लगातार चुनाव लड़ना होता है, जनता में हल्की सी भी गलत छवि ये झेल ही नहीं सकते। उसके उलट ये सरकारी बाबू खुल्ले सांड हैं, इनको अपनी कुर्सी/नौकरी बनाये रखने के लिए कोई चुनाव नहीं लड़ना इसलिए जनता इनके ठेंगे पे रहती है। इन्हें बस जैसे तैसे एकबार नौकरी में घुसना होता है उसके बाद ये चादर तानकर सोने,निठल्ले बन कुर्सी तोड़ने और ऊपर की कमाई का मोटा पैसा बना सकने के सपने देखते हैं( हर आम विद्यार्थी और मां बाप सरकारी नौकरी इन्ही सपनों के लिए पाना चाहता है, ये एक कड़वा सच है)।

..... ऊपर से हम कथित आम जनता भी कहाँ पीछे है। हम रोना-धोना और शिकायत करने में हर दम मुस्तैद रहते हैं। देश और समाज की हर कमी का ठीकरा किसी मोदी या राहुल गांधी पे फोड़ने को ऐसे तैयार रहते हैं जैसे तो हम स्वयं तो राजा हरिश्चन्द्र और भगवान राम हों पर बाकी सारा जहां दुष्टात्माएँ हैं। आप अपनी छाती पे हाथ रखिये और सोचिये कि संविधान में लिखे मूल कर्तव्यों को छोड़िए हम तो ट्रैफिक रूल, कचरा निस्तारण, प्राकृतिक संसाधनों के उचित उपभोग, अनजान लोगों से विनम्र संभाषण जैसे छोटे छोटे नैतिक कर्तव्य पूरे नहीं करते। लेकिन संविधान में लिखे मूल अधिकारों के नाम पर दो दो टके के कथित बुद्धिजीवी या छुटभैये नेतागण आपको ऊल जलूल पट्टी पढ़ाकर आपको चक्काजाम, तोड़फोड़, आगजनी जैसे अनैतिक अपराध के लिए आराम से तैयार कर लेते हैं।

.......यदि आपमें थोड़ा भी स्वाभिमान जिंदा है तो राजनेताओं की आलोचना भले ही करिये और मताधिकार से अच्छे लोग चुनिए, सभी खराब हैं का बहाना नहीं चलेगा क्योंकि तुम खुद तो राजा हरिश्चन्द्र और भगवान राम हो ? तो आप खुद चुनाव लड़ें, जीते और शासन चलाएं परन्तु इस सब के साथ इस अनुशासनहीन आम जनता और जनता में से ही आने वाले इन सरकारी दामादों के टेंटुए भी पकड़ें ।

.......यकीन मानिए आपके डे टू डे के निजी और सार्वजनिक जीवन में 95% कष्ट आप स्वयं के या ये आम जनता और आम जनता में काउंट किये जाने वाले सरकारी दामादों के दिये हुए हैं। ये जो हर मामले में नेताओं, सरकारों या और किसी उद्योगपति समृद्ध सुखी इंसान को जो विलेन बनाया जाता है वो बहुत बड़ा wrong number है।




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